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राजेंद्रग्राम के जंगलों में जुए का काला साम्राज्य, खाकी की चुप्पी पर सवाल

अनूपपुर - राजेंद्रग्राम थाना क्षेत्र के घने जंगल इन दिनों अपराध की प्रयोगशाला बनते जा रहे हैं। ताजा आरोपों के मुताबिक यहां 15 जिलों के जुआरियों का संगठित जमावड़ा रोज़ाना हो रहा है, जहां प्रतिदिन करीब 5 लाख रुपये की नाल वसूली की जा रही है। जुए के इस अवैध धंधे ने न सिर्फ कानून-व्यवस्था को चुनौती दी है, बल्कि खाकी की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

सूत्रों के अनुसार, जंगलों में संचालित इस “अंतरराज्यीय जुआ फंड” में मध्यप्रदेश के साथ-साथ छत्तीसगढ़ के कई जिलों से खिलाड़ी पहुंच रहे हैं। बताया जाता है कि यह खेल महज ताश तक सीमित नहीं, बल्कि संगठित अपराध का पूरा नेटवर्क बन चुका है, जहां कर्ज, जमीन और यहां तक कि महिलाओं के जेवर तक दांव पर लग रहे हैं। आरोप है कि पुराने आपराधिक संबंधों और कथित “सेटिंग” के दम पर यह धंधा फल-फूल रहा है।

सबसे चौंकाने वाला दावा यह है कि नाल वसूली के एवज में ‘सेट’ की व्यवस्था है, जिसके चलते कार्रवाई नाम मात्र की रह जाती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि थाना क्षेत्र से महज कुछ किलोमीटर भीतर खुलेआम जुआ चलता है, फिर भी न तो नियमित छापे पड़ते हैं, न ही बड़ी गिरफ्तारी होती है। इससे यह शंका गहराती है कि कहीं न कहीं संरक्षण मिल रहा है।

ग्रामीणों का आरोप है कि जुए की लत ने युवाओं को अपराध की ओर धकेला है। कर्ज में डूबे परिवार, बढ़ती चोरी-चकारी और घरेलू विवाद इसकी सामाजिक कीमत बन रहे हैं। वहीं, जंगलों में आवाजाही बढ़ने से वन क्षेत्र की शांति और सुरक्षा भी खतरे में है।

इस पूरे मामले ने लोकतंत्र की मर्यादा पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। अगर आरोप सही हैं तो यह केवल कानून की विफलता नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही की भी परीक्षा है। अब निगाहें उच्चाधिकारियों पर हैं—क्या वे निष्पक्ष जांच कराकर इस नेटवर्क की कमर तोड़ेंगे, या फिर जंगलों में जुए का यह काला खेल यूं ही चलता रहेगा?

स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने स्वतंत्र जांच, सख्त कार्रवाई और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग की है। सवाल सीधा है—कब टूटेगा जुए का यह जाल, और कब लौटेगा कानून का डर?


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